बिहार की स्वास्थ्य शिक्षा व्यवस्था में गहराता संकट, लाखों छात्रों के भविष्य पर मंडरा रहा खतरा

बिहार में शिक्षा सुधार और स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावों के बीच स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़ी एक गंभीर समस्या लगातार गहराती जा रही है। वर्ष 2022 में स्थापित बिहार यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज (BUHS) को राज्य के मेडिकल, नर्सिंग, फार्मेसी, पैरामेडिकल और फिजियोथेरापी शिक्षा को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से बनाया गया था। उम्मीद थी कि इससे शैक्षणिक सत्र नियमित होंगे, परीक्षाएं समय पर आयोजित होंगी और छात्रों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिलेगा।
लेकिन विश्वविद्यालय के गठन के चार वर्ष बाद भी स्थिति उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत दिखाई दे रही है। कई कोर्सों के सत्र पीछे चल रहे हैं, परीक्षाएं लंबित हैं और हजारों छात्र अपने भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति में हैं।
दो लाख से अधिक छात्रों का भविष्य अधर में
बिहार यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज के अंतर्गत पूरे बिहार में मेडिकल, नर्सिंग, फार्मेसी, फिजियोथेरापी और पैरामेडिकल से जुड़े 500 से अधिक कॉलेज संचालित होते हैं। इन संस्थानों में हर वर्ष बड़ी संख्या में छात्र दाखिला लेते हैं।
अनुमान के अनुसार, विश्वविद्यालय से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दो लाख से अधिक छात्र जुड़े हुए हैं। ऐसे में यदि शैक्षणिक सत्र लगातार प्रभावित होते हैं, तो इसका सीधा असर लाखों युवाओं के करियर, रोजगार और उच्च शिक्षा के अवसरों पर पड़ता है।
छात्रों का कहना है कि समय पर परीक्षा नहीं होने के कारण वे न तो अगले सेमेस्टर में आगे बढ़ पा रहे हैं और न ही अन्य शैक्षणिक एवं रोजगार संबंधी अवसरों का लाभ उठा पा रहे हैं।
2022 से लंबित सत्र, आज भी नहीं मिली रफ्तार
फार्मेसी समेत कई पाठ्यक्रमों में वर्ष 2022 से शुरू हुए शैक्षणिक सत्र अब तक पूरी तरह नियमित नहीं हो सके हैं। कई संस्थानों में छात्रों का कहना है कि सत्र और परीक्षाओं के बीच महीनों का अंतर है।
विश्वविद्यालय की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ही सत्र नियमित करना था, लेकिन चार वर्षों के बाद भी कई कोर्स अपने निर्धारित शैक्षणिक कैलेंडर से काफी पीछे चल रहे हैं।
फिजियोथेरापी छात्रों की बढ़ी चिंता
सबसे गंभीर स्थिति फिजियोथेरापी और बीपीटी के छात्रों की बताई जा रही है। वर्ष 2024 में प्रवेश लेने वाले कई छात्रों का पहला सेमेस्टर परीक्षा तक आयोजित नहीं हो सका है।
छात्रों का कहना है कि लगभग दो वर्ष का समय बीतने के बावजूद यदि प्रथम सेमेस्टर की परीक्षा भी नहीं होती है, तो यह न केवल उनकी पढ़ाई को प्रभावित करता है, बल्कि मानसिक तनाव और भविष्य की अनिश्चितता भी बढ़ाता है।
नर्सिंग और पैरामेडिकल छात्रों में भी बढ़ रही नाराजगी
नर्सिंग, जीएनएम और अन्य पैरामेडिकल कोर्सों से जुड़े छात्र भी लंबे समय से परीक्षा और परिणाम को लेकर परेशान हैं। कई छात्रों का कहना है कि वे लगातार विश्वविद्यालय और प्रशासन से जवाब मांग रहे हैं, लेकिन उन्हें केवल आश्वासन ही मिल रहा है।
समय पर सत्र पूरा नहीं होने से कई छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं, सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा के अवसरों से भी वंचित हो सकते हैं।
"बहुत जल्द परीक्षा होगी"—लेकिन कब?
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कई मौकों पर यह कहा गया कि परीक्षाएं जल्द आयोजित कराई जाएंगी और शैक्षणिक सत्र को नियमित किया जाएगा। हालांकि, छात्रों का आरोप है कि ये आश्वासन अभी तक धरातल पर दिखाई नहीं दिए हैं।
लगातार टलती परीक्षाओं ने छात्रों के बीच निराशा और असंतोष का माहौल पैदा कर दिया है।
आर्थिक और मानसिक दबाव झेल रहे छात्र
कई छात्र ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। उनके अभिभावक बड़ी मुश्किलों से फीस, हॉस्टल और अन्य खर्चों का प्रबंध करते हैं।
जब सत्र समय पर पूरा नहीं होता, तो छात्रों को अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। कई मामलों में छात्रों को हॉस्टल और किराए का खर्च भी लंबे समय तक उठाना पड़ता है।
इसके साथ ही मानसिक तनाव, करियर की चिंता और भविष्य की अनिश्चितता भी लगातार बढ़ रही है।
क्या बिहार के युवाओं के साथ हो रहा है अन्याय?
देश के कई राज्यों में स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े पाठ्यक्रम समय पर पूरे हो रहे हैं, परीक्षाएं नियमित हो रही हैं और छात्र समय पर डिग्री प्राप्त कर रोजगार की ओर बढ़ रहे हैं।
वहीं बिहार के हजारों छात्र वर्षों तक परीक्षा और परिणाम का इंतजार करने को मजबूर हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राज्य के युवाओं के साथ शैक्षणिक स्तर पर अन्याय हो रहा है?
स्वास्थ्य शिक्षा पर असर, स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी पड़ेगा प्रभाव
स्वास्थ्य क्षेत्र किसी भी राज्य की रीढ़ माना जाता है। यदि नर्सिंग, फार्मेसी, फिजियोथेरापी और पैरामेडिकल शिक्षा समय पर पूरी नहीं होगी, तो इसका प्रभाव आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता सीधे तौर पर शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी होती है। ऐसे में स्वास्थ्य शिक्षा में देरी भविष्य में बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकती है।
सरकार और विभागों की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
अब तक शिक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग की ओर से इस मुद्दे पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़े इस गंभीर मुद्दे पर सरकार को तत्काल संज्ञान लेना चाहिए।
छात्रों की प्रमुख मांगें
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लंबित परीक्षाओं का तत्काल आयोजन।
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सभी कोर्सों का शैक्षणिक कैलेंडर जारी किया जाए।
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सत्र को नियमित करने के लिए रोडमैप तैयार हो।
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लंबित परिणामों का समयबद्ध प्रकाशन किया जाए।
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सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन संयुक्त बैठक कर समाधान निकाले।
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छात्रों के हित में विशेष निगरानी समिति गठित की जाए।
निष्कर्ष: अब और इंतजार नहीं
बिहार यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज का गठन स्वास्थ्य शिक्षा को नई दिशा देने के उद्देश्य से किया गया था। लेकिन यदि लाखों छात्र वर्षों तक परीक्षा और परिणाम का इंतजार करते रहें, तो यह केवल प्रशासनिक देरी नहीं बल्कि एक गंभीर शैक्षणिक संकट बन जाता है।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार, विश्वविद्यालय प्रशासन और संबंधित विभाग इस मुद्दे को प्राथमिकता दें। क्योंकि यहां केवल परीक्षाओं की बात नहीं है, बल्कि दो लाख से अधिक छात्रों के सपनों, करियर और भविष्य का सवाल है।

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